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अनकही बातें (Thoughtful Poem)
अनकही बातें (Thoughtful Poem) वो अखंड अभिशाप था, हाँ वो मेरा पाप था! ना कोई पराकाष्ठा, ना कोई आधार था! यूँ तो मैं अभिमानवश, हर पाप से अनजान था! जब खुली ये नींद मेरी, अपने आप से परेशान था! वो जो मेरा एक मान था, खुद से भी नाराज़ था! जीतने को मेरे लिए, मुझसे ही लड़ने को तैयार था! खुद को ही झकझोर रख दे, बस यही अब माँग था! जीत वो गया था मुझसे, जो मैं झुकने को तैयार था! — जो मैं झुकने को तैयार था।

CLAT Mentor Neeraj Sir
Jul 11, 2023


यु तो तु भोली बहुत है
यु तो तु भोली बहुत है, खुद में ही खोई बहुत है ! लोग शायद समझे बुराई, पर दिल से तु प्यारी बहुत हैं ! तेरी सादगी को जिसने भी जाना, उसके लिए तु न्यारी बहुत है ! तु कहां समझा भी पायी, तेरी अधर्मों से दुरी बहुत है ! जिसने देखा, अपना समझा, तेरी अपनी एक छवि है ! जो ना तु लोगों के जैसी, कहा सबने तु बुरी बहुत है ! प्रतिस्पर्धा के दौर में, सबसे पीछे क्यु तु पड़ी है ! जो ने तुने खुल्के बोला, सोचा सबने खाई पड़ी है ! तेरे हर एक चुप्पी को, हर पल यहां रगड़ा है सबने ! शांत जो बैठी है तु, अब

CLAT Mentor Neeraj Sir
Sep 9, 2019
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