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अनकही बातें (Thoughtful Poem)
अनकही बातें (Thoughtful Poem) वो अखंड अभिशाप था, हाँ वो मेरा पाप था! ना कोई पराकाष्ठा, ना कोई आधार था! यूँ तो मैं अभिमानवश, हर पाप से अनजान था! जब खुली ये नींद मेरी, अपने आप से परेशान था! वो जो मेरा एक मान था, खुद से भी नाराज़ था! जीतने को मेरे लिए, मुझसे ही लड़ने को तैयार था! खुद को ही झकझोर रख दे, बस यही अब माँग था! जीत वो गया था मुझसे, जो मैं झुकने को तैयार था! — जो मैं झुकने को तैयार था।

CLAT Mentor Neeraj Sir
Jul 11, 2023
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