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दानवीर कर्ण (Danveer Karna Poem)

Updated: Feb 5

Danveer Karna Poem by Neeraj Kumar

Danveer Karna Poem by Neeraj Kumar

वो तो कहां सुर्य पुत्र था, सूर्यास्त क्या उसे मरने देता!

जो सभी ने भीष्म की रण के नीति को मान देता !

तोड़ वो रण के सारे नियम, अधर्म को ऐसे जीया था !

दुर्योधन का तो पता नहीं, अंग राज मृत्यु पा रहा था !


वो तो कवच कुंडल के संग हुआ था, या यूं कहे कि विजयी ही पैदा हुआ था !

पर वो तो बड़ा दानी हुआ था, स्वयं इन्द्र को ही दान दिया था !

कहते तो थे लोग सुत्त पुत्र पर सबसे बड़ा अभिमानी हुआ था !


था वो अभागा, उम्र भर मातृ स्नेह से वंचित रहा था !

फिर उसी स्वार्थी माता को, पुत्र प्राण दान देकर, कोख कों संचित रखा था !


पाप उसने क्या किया था, जो प्रतिस्पर्द्धा उसने अर्जुन से रखा था !

बनना उसे वो वीर था, जो द्रोण ने अर्जुन को चुना था !

जो द्रोण से वंचित रहा था, परशुराम को उसने चुना था !

बोल अपने आप को ब्राह्मण, गुरु से छल जो किया था !

क्या पाप था वो, जो उसने हर दिन मरकर भी जिया था !


सुर्य के उस तेज से पहले ही आशा खो चुका था,

जब भिष्म के उस रण निती को दुर्योधन यूं ही खो दिया था !

कवच और कुंडल से उसने इन्द्र को ही शर्मिंदा किया था !

था वो गुरु का श्राप या फिर स्वयं कृष्ण की कोई चाल थी,

सुर्य तो निकला रहा था, पर ना उसमे आज कोई आग थी !

हो गया धराशाही वो वीर, अभी कहां सूर्यास्त थी,

अभी कहां सूर्यास्त थी !!

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