वीर अभिमन्यु (Veer Abhimanyu Poem)
Updated: Aug 7

Veer Abhimanyu Poem
सूर्य तो कोई और था, सूर्यपुत्र तो कोई और था!
अर्जुन तो कोई और था, कर्ण तो कोई और था!
थी मगर उसमें छिपी कहीं, सूर्य किरण कोई और था!
सुभद्रा का वो लाल था, श्रीकृष्ण का वो मान था!
यूँ तो वो एक बाल था, अर्जुन का आधार था!
देखने में वो यूँ यशस्वी, श्रीकृष्ण का ही अंशरूप था!
महारथी तो पता नहीं, पर अद्वितीय वो वीर था!
कौन उसको रोकेगा, जो वो कृष्ण-शिष्य पार्थपुत्र था!
वो दिन भी अब आ चुका था, जिस दिन के लिए श्रीकृष्ण ने उसे रचा था!
अब रणभूमि में कौरवों की सेना समीप थी, पार्थ आज दूर कहीं, फिर न कोई आस थी!
आ खड़ा वो वीर बालक, पांडवों की शान था!
गर्भ में मिली वो विद्या, अभिमन्यु का अभिमान था!
दुर्योधन ने जो चाल चली थी, चक्रव्यूह गुरु द्रोण ने रची थी!
सूर्य का वो तेज किरण, आग में जलता गगन!
आज वो निकला कहीं था, गुरु द्रोण के सामने खड़ा था!
काँप उठता था काल भी, जिन महारथियों के सामने!
आज एक सोलह वर्ष का बालक सामने खड़ा था!
सात से जो लड़े यथाचित, श्रीकृष्ण-शिष्य वो बाल था!
अर्जुन से भी अधिक तेज जिसका, सर्वश्रेष्ठ महावीर था!
कर चुका वो अंत अर्जुन-कर्ण द्वंद्व का, सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर था!
हर एक को घायल किया, किंचित भी न वो भयभीत था!
कौन उसे करे पराजित, जो न वो माधव देय बलिदान था!
हार और जीत का तो पता नहीं, पर
सूर्यास्त के पहले ही उस दिन, सूर्य तो कहीं खो गया था,
सूर्य तो कहीं खो गया था!!



Comments