दानवीर कर्ण (Danveer Karna Poem)
Updated: Aug 7

Danveer Karna Poem by Neeraj Kumar
वो तो कहाँ सूर्यपुत्र था, सूर्यास्त क्या उसे मरने देता!
जो सभी ने भीष्म की रण-नीति को मान दिया था!
तोड़ वो रण के सारे नियम, अधर्म को ऐसे जिया था!
दुर्योधन का तो पता नहीं, अंगराज मृत्यु पा रहा था!
वो तो कवच-कुंडल के संग हुआ था, या यूँ कहें कि विजयी ही पैदा हुआ था!
पर वो तो बड़ा दानी हुआ था, स्वयं इन्द्र को ही दान दिया था!
कहते तो थे लोग सूतपुत्र, पर सबसे बड़ा अभिमानी हुआ था!
था वो अभागा, उम्र भर मातृ-स्नेह से वंचित रहा था!
फिर उसी स्वार्थी माता को, पुत्र-प्राण दान देकर, कोख को संचित रखा था!
पाप उसने क्या किया था, जो प्रतिस्पर्धा उसने अर्जुन से रखा था!
बनना उसे वो वीर था, जो द्रोण ने अर्जुन को चुना था!
जो द्रोण से वंचित रहा था, परशुराम को उसने चुना था!
बोल अपने आप को ब्राह्मण, गुरु से छल जो किया था!
क्या पाप था वो, जो उसने हर दिन मरकर भी जिया था!
सूर्य के उस तेज से पहले ही आशा खो चुका था,
जब भीष्म की उस रण-नीति को दुर्योधन यूँ ही खो दिया था!
कवच और कुंडल से उसने इन्द्र को ही शर्मिंदा किया था!
था वो गुरु का श्राप या फिर स्वयं कृष्ण की कोई चाल थी,
सूर्य तो निकला रहा था, पर न उसमें आज कोई आग थी!
हो गया धराशायी वो वीर, अभी कहाँ सूर्यास्त थी,
अभी कहाँ सूर्यास्त थी!!



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