कुंभकर्ण: कर्तव्य, वीरता और बलिदान (Kumbhkarna Poem)

Kumbhkarna: कुंभकर्ण- कर्तव्य वीरता और बलिदान
ये भ्राता वीर अनमोल था, कर्तव्य वीर बलवान था!
धर्म उसका मान था, हर सच से वो जान था!
ब्रह्मा से श्रापित होकर, नींद में ही लीन था!
लंकेश का आधार था, सर्वशक्ति बलवान था!
लंका को जो रखे सुरक्षित, वो स्वयं ही पर्याप्त था!
यूँ तो बस वो नींद में लीन था,पर वो हर सत्य से भी जान था!
ब्रह्म का हर शब्द उसको,आज भी सब याद था!
लंकेश का कब अंत कैसे,ब्रह्मा का संदेश था!
जब नींद में वो यूँ पड़ा था,राक्षसों का अंत अब हो रहा था!
रावण भी अब जो रण में,एक बार यूँ पराजित हो गया था!
दे उसे जो प्राण दान,श्रीराम ने शर्मिंदा किया था!
जो उसे ना कोई राह अब दिखा था,कुंभकर्ण को ही जगाना बस एक राह था!
सैनिकों की एक टोली,हर एक कोशिश कर चुकी थी!
कौन उसको यूँ उठाए,जो वो ब्रह्मा-शापित नींद था!
भोजन का वो सुगंधित वास था,जिससे जागे वो महाबली,
जिसका हर श्वास ही प्रलय का आभास था!
जागा जब वो वीर वहाँ, चारों ओर विनाश था!
पूछा उसने लंकेश से, कैसा ये रण-प्रकाश था!
रावण ने जब बात कही, सीता का अपहरण था!
सुनकर वो भी मौन रहा, भ्राता उसका ही अधर्म था!
कहा, लंकेश ये धर्म नहीं, विनाश का आगाज़ था!
फिर भी तू मेरा भ्राता है, तेरा ही तो साथ था!
जानता था अंत अपना, मृत्यु उसका इंतज़ार था!
फिर भी रण में जा खड़ा, भ्राता का जो मान था!
जानता था श्रीराम को, जानता अपना अंत था!
फिर भी लंका के लिए, प्राण देना ही धर्म था!
रणभूमि में जब वो उतरा,देवों का भी ध्यान था!
वानर सेना काँप उठी,कुंभकर्ण का नाम था!
एक-एक कर वीर गिराए,रण में उसका मान था!
श्रीराम के सामने आकर,आज वही बलवान था!
जानता था वो श्रीराम को,जानता था अपना अंत!
फिर भी धर्म के नाम पर,करता रहा वो युद्ध अनंत!
कटे भुजाएँ, टूटा शरीर,फिर भी उसका प्राण था!
अंत समय तक भ्राता-धर्म ही,उसका सबसे बड़ा मान था!
वो राक्षस था, पर सत्य से कभी नहीं अनजान था!
अधर्म जानकर भी भ्राता संग,मृत्यु तक खड़ा महान था!
गिरा जब वो रणभूमि में,धरती भी हैरान थी!
कुंभकर्ण तो मर गया था,पर अमर उसकी शान थी!
ये भ्राता वीर अनमोल था,कर्तव्य वीर बलवान था!
धर्म उसका मान था,हर सच से वो जान था!




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